Sunday, September 9, 2012

मत कर इतना गरूर


मत कर इतना गरूर
अपने आप पे ऐ इन्सान
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न जाने कितने
तेरे जैसे
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खुदा ने
बना-बना के


मिटा दिए

Saturday, September 8, 2012

मंदिर ने मस्जिद 
के गले में हाथ डाल कर पूछा ............

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कुशल तो है 
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मस्जिद ने मायूस हो कर 
कहा.............
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सब बन्दों की मेहरबानी है 

हम तो मुफ्त में 
बरसों से बदनाम हैं .
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लेकिन जो सवाल 
तुमने मुझसे पूछा
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आओ यही सवाल 
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गुद्वारे से......चर्च से........

और आज के इन 
मठाधीशों से करें

निर्भय वक़्त की 'ऐश-ट्रे'
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मुझ में अपने अरमानों की
चिता जलाने का सहस है

मेरे गीतों के
प्रतीक , प्रतिमान ..............मूल्य
सब टूट गए हैं

निर्भय वक़्त की एश-ट्रे में
सुंदर सपनों की राख पड़ी है

सभी कल्पनायें झूठी थीं
बारी-बारी सब टूटीं

सब विश्वास खोखले निकले
सभी आस्थाएं झूठीं

Thursday, September 6, 2012


कुछ प्रश्न गुदगुदाते हैं, अच्छा लगता है.

जब उन प्रश्नों के उत्तर भी प् जाओगे 
तो कल्पना करो कैसा लगेगा 

जब आप मुस्कराते हैं, अच्छा लगता है.

मेरे मुस्कराने की 
न तो कोई वजह है 
और न ही इसमें कोई खूबी
जब तुम मुस्कराओगे 
तो क्या बात होगी 

वो हसीन नज़ारा नहीं जिनको मयस्सर,

नज़ारे के हसीन होने के कोइ मायने नहीं 
जब तक 
हसीन दिल 
और दिल की गहराइयों में
कैद आत्मा 
तक बाग-बाग न हो जाये   

तस्वीर बनाते हैं, अच्छा लगता है.

तस्वीर बनाने से भी कभी तस्वीर बनी है 
तस्वीर को देख तस्वीर होना पड़ता है
जब तुम सामने आते हो अच्छा लगता है
और तस्वीर तो खुद-ब-खुद ही बन जाती है 

अब नहीं हसीन लगते हैं ख्वाब जन्नत के

ख्वाबों के बहकावे में आये ही क्यूँ 
हकीकत को जो आजमा लेते 
मायूस न होते 
और जन्नत का दीदार क्या कभी किसी ने किया है 
हमारा साथ निभाते तो यहीं जन्नत होती 

आपके घर आते हैं, अच्छा लगता है

मेरा घर भी कोई घर है
ईंट पत्थर से बनी इमारत घर हो भी कैसे सकती है
आप आते हो तो वो घर सा हो जाता है 
इनायत है आपकी कुछ पल के लिए ही सही घर तो कहलाता है



पतंगें  उड़  रही  थीं
हाँ ...पतंगें  उड़  रही  थीं
काली , नीली , पीली , लाल
हरी , जामुनी  और  नारंगी

कि  पक्षी  जा  रहे  थे
हमें  यूं  बता  रहे  थे

यह  ज़िन्दगी
छोटी  सी  है
आखिर  सभी  ने  जाना

इस  दुनियां  में ...इस  घर  में
इस  गाँव  में ...नगर  में
'तनपुर' में
नहीं  है
किसी  का  भी
पक्का  ठिकाना

पतंगें  उड़  रही  थीं
वोह  ज्यूं  बता  रही  थीं
यूं  ही  आत्मा  उड़  जायेगी,
उस  दीप  में  मिल  जायेगी
बनाया  जिस-ने  सब-को  है
कि  मिलना  जिस-में  सब-को  है

कि  पक्षी  जा  रहे  थे
वोह  यूं  बता  रहे  थे

आज  यहाँ-कल  वहाँ
रहना  किस-को  है  यहाँ
क्षण-भंगुर  है  जहाँ

पतंगें  उड़  रही  थीं
कि  पक्षी  जा  रहे  थे

Tuesday, September 4, 2012


मुहब्बत  के   सपने  दिखाते  बहुत  हैं 

     हमारा साथ अपनाओ 
      सपनों को हकीकत में बदलने का 
      नुस्खा हमारे पास है 

वो  रातों  में हम  को  जगाते   बहुत   हैं 
   
        हमारे पहलू मैं आओ 
      लोरी सुना के सुला देंगे 

मैं आँखों  में काजल  लगाऊँ तो  कैसे 
इन  आँखों  को  लोग  रुलाते  बहुत  हैं 

          आंसुओं को पी जायेंगे 
       रुलाने वालों को इतना रुलाएंगे
       कि वो रोना और रुलाना 
       दोनों भूल जायेंगे 
       फिर अपने हाथों से 
       पलकों को उठा  
       उँगलियों के पोरों से 
       खुद आप कि आँखों में हम 
       काजल सजायेंगे 


Monday, September 3, 2012



















मैं
अपनों  से  दूर..........
बहुत  दूर
निकल  आया  हूँ

जो  अपने .......
अपने  हो  कर भी .......
अपने ना  हों


उन  अपनों  में
अपना-पन
कैसे  ढूँढूँ




अब  तो  यूं  लगता  है
मैं से  भी
मेरा  नाता
टूट  सा  गया  है मैं  खुद  भी
अपना  नहीं  रह  गया  हूँ









मुझ  में से  कोई
मुझको
निकाल ले  गया  है


केवल  लाश
लिए  फिरता  हूँ