Wednesday, November 28, 2012

ठंडा-मीठा मौसम है और बागों में बहार है


ठंडा-मीठा मौसम है 
और बागों में बहार है 
यौवन की मदमस्त 
आँखों में खुमार है

फूलों के चेहरे  पे 
मुस्काह्ट आई है
किसी देवकन्या ने 
ज्यूं ली अंगड़ाई है 

ठंडी समीर से 
पत्ते जो हिलते हैं
लगता है ऐसे ज्यूं 
बिछुड़े दिल मिलते हैं 



टकराती हैं टहनियां 
आपस में ऐसे 
मिलते हैं बिछुड़े प्रेमी .
बरसों बाद जैसे

रातों में चंदा की 


चांदनी यूं बरसे है 
कि ठंडी हों आंखें
जो बरसों से तरसे हैं 


रातों को चंदा जो 
लुक-चिप सी करता है 
झीने-झीने पर्दों में ज्यूं 
यौवन थिरकता है 

मासूम मुखड़ों पे 
लाली यूं छाई है
कि परियों की सुन्दरता
ज्यूं यहीं सिमट आई है 

सेब जैसे गालों पे 
मन मदहोश हुआ जाता है 
सूनी काली रातों में
याद कोइ आता है 


भीगी-भीगी पलकों से 
इंतज़ार करते हैं 



कैसे समझाएं तुन्हें 
कि तुझसे  प्यार करते हैं







 



Tuesday, November 20, 2012


जब गम नहीं था तेरा 



गम से बरी हुआ था 


गमगीन तेरे गम में 


गम से बरी हुआ हूँ 


हंसता था रात दिन मैं 


दिल में खुशी नहीं थी 


रो-रो के तेरे गम में 


अब बहुत खुश हुआ हूँ

Monday, November 19, 2012


ऊपर वाले को भी हमारी कमी खलने लगी है 
देखो-देखो मेरी उम्र ढलने लगी है 

एक साल और हो गया कम 
इस जहां की बस्ती अब उजड़ने लगी है 

उलटी गिनती हो चुकी है शुरू
50.51..52...53.....54....55.......56.........
और लो .......... 57   
भी हुए पूरे 

आज न जाने क्यूं 
ये वस्त्र  मैले व् पुराने लगने लगे हैं 

बस अब नये वस्त्र आने वाले हैं 
हम अब यहाँ से जाने वाले हैं 

जो पल बाकी हैं उन्हें हंसते-खेलते गुजारना होगा 
अपनी सब काबलियतों  को निखारना होगा 

आखिर अपने घर वापिस जाना है
उस भेजने वाले को भी तो मुंह दिखाना है 

जल्दी जल्दी  सब समेट लूं 
अपनी आभा को कुछ और निखार लूं

बस इतना समय दे देना मालिक 
अपनी .....
न-न तेरी बिछाई बिसात 
को खुशी खुशी खेल सकूं 

फिर जब चाहे आवाज़ दे लेना
मैं दौड़ा  चला आऊँगा 
तेरे आगोश में सो जाऊंगा 

Sunday, November 18, 2012

कैसा अभागा हूँ मैं




कैसा  अभागा  हूँ  मैं 
जो  वायदा  कर  के  भी  निभा  नहीं  सकता 
खुशी  मिलने  पे  भी  जो  मुस्का   नहीं  सकता 

जिसे  गाना  ना   आये , वोह  तो  गायेगा  क्या 
में  गायक  होते  हुए  भी  जो  गा  नहीं  सकता 


इस  दुनिया  में  रहना  नहीं  चाहता 
इसे  छोड़  के  भी  जा  नहीं  सकता 

लोग  तो  करते  ही  हैं  कामना  स्वर्ग  मिलने  की 
मुझको  मिल  गया  है , फिर  भी  उस को  पा  नहीं  सकता 

प्यासा  ग़र जाये तो  जाये  पास  कूएँ  के 
मगर  जब  कुआँ  चल  के  पास  मेरे  आ  गया  है 

रस्सी  भी  है , और  है  बाल्टी  भी 
मग़र  फिर  भी  पानी  खींच  के 
अपनी  प्यास  बुझा  नहीं  सकता 

कैसा  अभागा  हूँ  मैं 

ਜਦ ਪਾਣੀ ਸਿਰ ਤੋਂ ਲੰਘ ਜਾਵੇ


ਜਦ ਪਾਣੀ ਸਿਰ ਤੋਂ ਲੰਘ ਜਾਵੇ 
ਜਦ ਹੱਦ ਦੀ ਵੀ ਹੱਦ ਗੁਜਰ ਜਾਵੇ 
ਰੋਨਾ-ਕੁਰਲਾਉਣਾ ਸਬ ਬੇਕਾਰ ਹੋ ਜਾਵੇ
ਤਾਂ ਦੱਸੋ ਬੰਦਾ ਕਿਹੜੇ ਖੂਹ ਚ ਜਾਵੇ 
ਸਿਵਾ "ਜੇਹਾਦ" ਦੇ ਜਿਸਨੂ .........
ਹੜਤਾਲ, ਜਾਮ, ਸੰਘਰਸ਼ ਦਾ ਏਲਾਨ 
ਯਾ ਬਗਾਵਤ ਵੀ ਕਿਹਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ 
ਹੋਰ ਕੋਈ ਰਸਤਾ ਵੀ ਤਾਂ ਨਹੀਂ 
ਭੁੱਲੇ ਬਿਸਰੇ ਹੁਕਮਰਾਨਾ ਨੂੰ 
ਸਹੀ ਰਸਤੇ ਤੇ ਲਿਆਓਨ ਦਾ 

Saturday, November 17, 2012


ये सांसें ऐसा कम्बल हैं 
जिसे हेर कोइ छोड़ने की बात करता है
छोड़ना कोई चाहता नहीं
.
.
.
.
जब छोड़ने का वक्त आता है
तो मन चाहता है 
कुछ पल और-कुछ पल और-कुछ पल और.............

यह कम्बल-साँसों का रिश्ता भी अजीब है